विश्वामित्र
विश्वामित्र वैदिक कालके विख्यात ऋषि (योगी) हलन । ऋषि विश्वामित्र बड़ी प्रतापी आउ तेजस्वी महापुरुष हलन । ऋषि धर्म ग्रहण करेके पहिले ऊ बड़ पराक्रमी आउ प्रजावत्सल नरेश कौशिक हलन ।
| विश्वामित्र | |
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राजा रवि वर्मा द्वारा विश्वमित्र |
रचना
सम्पादित करथिनविश्वमित्रजीके गायत्री मन्त्रके दृष्टान्त होलै । ऋग्वेदके तीसरा मण्डलमे उपस्थित गायत्री मन्त्रके रचना विश्वामित्र द्वारा कैल गेलै हल ।
उल्लेख
सम्पादित करथिनरामायण
सम्पादित करथिनक्षत्रिय राजा
सम्पादित करथिनप्रजापतिके पुत्र कुश, कुशके पुत्र कुशनाभ आउ कुशनाभके पुत्र राजा गाधि हलन । विश्वामित्रजी ओही गाधिके पुत्र हलन ।[२] विश्वामित्र शब्द विश्व आउ मित्रसे बनल है जेकर अर्थ है - सबके साथे मैत्री अथवा प्रेम । विश्वामित्रके पिता गाधि जखनि अपन आयुके जादे देखके वानप्रस्थ जाएके निर्णय कैलन आउ अपन पुत्र विश्वामित्रके अपन राज गद्दी पर राजतिलक कर देलन, ऊ अपने वानप्रस्थके चल गेलन । ओकर बाद विश्वामित्र बड़ी बेससे राजकाजके सम्भारलन, उनकर प्रजो बड़ी खुश हलै । एक समय ऊ अपन पत्नीके साथे सरक पासा (एक तरहके शतरञ्ज) खेल रहलन हल । ऊ खेलमे उनकर पत्नीके विजय होवे पर उनकर पत्नी हँसे लगलन जे विश्वामित्रजीके ई निमन न लगलै त गोस्सासे सरक पासा (मने गोटी) के तुरत तोड़के फेक देलन । आउ ऊ अपन राजदरबारमे गेलन ओहाँ उनकर भाट आउ राज्यसभाके मन्त्री द्वारा जय जयकार करे लगलन । त विश्वामित्रजी एके प्रश्न कैलन कि हमर जय-जयकार काहेला कैल जाइत है । जखनिकि अखनिए तक हम कोनो जय जयकार करे वाला कार्ये न कैली हे । ओही समय ऊ आदेश देलन कि अपन राज्यके जेतनो बारह वर्षसे अधिकके लैकन आउ जवान व्यक्ति एवं निपुण सैनिक सब सेनाके साथे युद्धला हमरा साथ चले । हम अपन राज्यविस्तार करेके निर्णय कर लेली हे । अखनि सब बारह वर्षके लैकन आउ जवान व्यक्ति निपुण सैनिक युद्धमे चल गेलन आउ बारह वर्ष तक ऊ अपन राज्यके विस्तार करित रहलन । जे राजा अपन आत्मसमर्पण कैलकै त बेस न त युद्ध द्वारा जीतके बड़ी मनी राजाके राज्य अपना अधीन कर लेलन । फिर ऊ अपन राज्य दने वापिस आवित खनि श्री वशिष्ठ ऋषिके आश्रम भिरु सेना सहित शिविर डालके रुकलन । श्री ऋषि वशिष्ठके शिष्य ऋषिवरके सूचना देलन कि अपन राजा विश्वामित्रजी अपन आश्रम भिरु शिविर डालके रुकल हथिन आउ उनका साथे बड़ी बड़ सेनो आके रूकल है । ऋषि अपन शिष्यके आज्ञा देलन कि विश्वामित्रजीके अतिथि ग्रहणला बुलौथिन । विश्वामित्रजी ई निमन्त्रण ग्रहण कैलन । आउ एक दिन राजा विश्वामित्र अपन कुछ सैनिकके लेके श्री वशिष्ठ ऋषिके आश्रममे गेलन । विश्वामित्रजी उनका प्रणाम करके ओहैँ बैठ गेलन । वशिष्ठजी विश्वामित्रजीके यथोचित आदर सत्कार कैलन आउ उनकासे कुछ दिन आश्रमेमे रहके आतिथ्य ग्रहण करेके अनुरोध कैलन । एकरा पर ई विचार करके कि हमरा साथे विशाल सेना है आउ सेना सहित हमर आतिथ्य करेमे वशिष्ठजीके कष्ट होतै, विश्वामित्रजी नम्रतापूर्वक अपन जाएके अनुमति माङ्गलन किन्तु वशिष्ठजीके अत्यधिक अनुरोध करे पर तनी दिनला उनकर आतिथ्य स्वीकार कर लेलन ।
वशिष्ठजी नन्दिनी गौके आह्वान करके विश्वामित्र आउ उनकर सेनाला छौ प्रकारके व्यञ्जन आउ समस्त प्रकारके सुख सुविधाके व्यवस्था कर देलन । वशिष्ठजीके आतिथ्यसे विश्वामित्र आउ उनकर साथे आएल सब लोग बड़ी प्रसन्न होलन ।
नन्दिनी गौके चमत्कार देखके विश्वामित्र ऊ गौके वशिष्ठजीसे माङ्गा पर वशिष्ठजी बोललन राजन! ई गौ हमर जीवन है आउ एकरा हभ कोनो मोल पर कोनोके न दे सकऽ हियै ।
वशिष्ठजीके ई प्रकार कहे पर विश्वामित्र बलात् ऊ गौके पकड़ लेवेके आदेश दे देलन आउ उनकर सैनिक ऊ गौके डण्डासे मार मारके हाँके लगलै । नन्दिनी गौ क्रोधित होके ऊ सब सैनिकसे अपन बन्धन छोड़ा लेलकै आउ वशिष्ठजी भिरु आके विलाप करे लगलै । वशिष्ठजी बोललन हे नन्दिनी! ई राजा हमर अतिथि है एहीसे हम इनका शापो न दे सकियै आउ इनका भिरु विशाल सेना होवेके कारण इनकासे युद्धोमे विजय प्राप्त न कर सकियै । हम स्वयंके विवश अनुभव करित हियै । उनकर ई सब वचनके सुनके नन्दिनी कहलक कि हे ब्रह्मर्षि! अपने हमरा आज्ञा देथिन, हम एक क्षणमे ई क्षत्रिय राजाके उनकर विशाल सेनासहित नष्ट कर देबै । आउ कोनो उपाय न देखके वशिष्ठजी नन्दिनीके अनुमति दे देलन ।
आज्ञा पौतहीँ नन्दिनी योगबलसे अत्यन्त पराक्रमी मारक शस्त्रास्त्रसे युक्त पराक्रमी योद्धाके उत्पन्न कैलक जे शीघ्रे शत्रु सेनाके गजड़ा मुरै नियन काटेला आरम्भ कर देलकै । अपन सेनाके नाश होवित देख विश्वामित्रके सौ पुत्र अत्यन्त कुपित हो वशिष्ठजीके मारने दौड़लै । वशिष्ठजी ओकरामे से एक पुत्रके छोड़के शेष सबके भस्म कर देलन ।
अपन सेना आउ पुत्रके नष्ट हो जाएसे विश्वामित्र बड़ दुःखी होलन । अपन बचल पुत्रके राज सिंहासन सौँपके ऊ तपस्या करेला हिमालयके कन्दरामे चले गेलन । कठोर तपस्या करके विश्वामित्रजी महादेवके प्रसन्न कर लेलन आउ उनकासे दिव्य शक्तिके साथे सम्पूर्ण धनुर्विद्याके ज्ञानके वरदान प्राप्त कर लेलन ।
सन्दर्भ
सम्पादित करथिन- ↑ "CANTO XX.: VIS'VÁMITRA'S VISIT". Sacred Texts.
For Kus'ik's son the youth will shield. He is incarnate Justice, he The best of men for bravery...Jayá and Vijayá, most fair, And hundred splendid weapons bare. Of Jayá, glorious as the morn, First fifty noble sons were born...And fifty children also came Of Vijayá the beauteous dame,
{{cite web}}: line feed character in|quote=at position 126 (help) - ↑ "CANTO XX.: VIS'VÁMITRA'S VISIT". Sacred Texts.
He said to those who kept the gate: 'Haste, warders, to your master run, And say that here stands Gádhi's son.'