हिन्दु वर्ण व्यवस्था
हिन्दु वर्ण व्यवस्था हिन्दुधर्ममे पारम्परिक हिन्दु समाजके भीतरे एगो सामाजिक वर्गके सन्दर्भित कर है ।[१] ई विचार मनुस्मृति जैसन ग्रन्थमे पाएल जा है[२][३] जे चार वर्णके वर्णन आउ वर्गीकरण कर है । साथे उनकर व्यवसाय, आवश्यकता आउ कर्तव्य या धर्मोके निर्धारित कर है ।[४][५]
- ब्राह्मण : वैदिक विद्वान, चिकित्सक, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, पुजारी, शिल्पी या शिक्षक । सबके मूलमे सात्विक गुण
- क्षत्रिय : शासक, प्रशासक या योद्धा । सबके मूलमे राजसिक, तनी सात्विक गुण
- वैश्य : व्यापारी । सबके मूलमे तामसिक, राजसिक गुण[६]
- शूद्र : कुटीर, मझोला उद्योग, तकनीकी कार्य, गृह बर्तन फर्नीचर निर्माण, सेवक । सबके मूलमे तामसिक, तनी राजसिक गुण
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ई चार भाग वाला विभाजन एक प्रकारके सामाजिक श्रेणीकरण है जेकि जातिके अधिक विस्तृत प्रणालीसे ढेर अलगे है, जे "कास्ट" के यूरोपीय अवधारणाके समान है ।[७]
वर्ण व्यवस्थाके चर्चा हिन्दु ग्रन्थमे कैल गेलै हे आउ एकरा आदर्श मानवीय आह्वानके रूपमे बुझल गेलै हे ।[८][९] ई अवधारणाके मूल सामान्यतः ऋग्वेदके पुरुष सूक्तसे लेल गेलै हे । उत्तरवैदिक कालमे वर्ण विभाजनके वर्णन महाभारत, पुराण आउ धर्मशास्त्र साहित्य मे भेट है ।[१०]
मनुस्मृति मे वर्ण व्यवस्था पर टिप्पणी बेर-बेर उल्लेख होवेके बावजूदो[११] ढेर हिन्दु ग्रन्थ आउ सिद्धान्त सामाजिक वर्गीकरणके वर्ण व्यवस्था पर प्रश्न उठाव है आउ ओकरासे असहमत है ।[१२]
भारतमे जे समुदाय चार वर्ण या वर्गमे से कोनो एकसे सम्बन्धित है ओकरा सवर्ण हिन्दु कहल जा है । दलित आउ आदिवासी जे कोनो वर्णसे सम्बन्धित न है ओकरा अवर्ण कहल जा है ।[१३][१४][१५]
व्युत्पत्ति आउ उत्पत्ति
सम्पादित करथिन"वर्ण" शब्द ऋग्वेद आउ महाभारत नियन प्राचीन ग्रन्थमे पाएल जा है । एकर अर्थ "कर्मसे सञ्चित गुण पर आधारित जनम है । अतः ई जनम आधारित शरीर है जे पूर्वजनमके कर्मसे भेटलै हे । मनुस्मृतिमे "वर्ण" के तात्पर्य लाखो जनमके कर्मसे सञ्चित विकसित गुणके आधार पर जनम है आउ जैसन आम, पपीता, नीम, बबूल सब उत्तम पर उनकर हाइब्रिड वर्ण विवाहसे विनाशकारी वृक्ष उत्पन्न होतै । वर्ण सङ्कर कुलघ्नानाम्, गीतामे वर्णके मध्य आउ वाह से सङ्कर उत्पन्न होके धर्मविरोधी कुल घातक होव है ।[२][३]
वेद
सम्पादित करथिनऋग्वैदिक पुरुष सूक्तके नामसे जानल जाएवाला प्राचीन पाठ चार सामाजिक वर्गमे औपचारिक विभाजनके वर्णन कर है । पाठमे ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य आउ शूद्र वर्गके तुलना आदिकालीन यज्ञ खनी शरीरके विभिन्न अङ्गसे कैल गेलै हे ।[१६]
११. जखनि ऊ पुरुशके विभाजित कैलन त ऊ केत्ता भाग बनौलन ? ऊ ओकर मुँह, ओकर भुजाके का कह हथिन ? ऊ ओकर जाङ्घ आउ गोड़के का कह हथिन ? १२. ब्राह्मण उनकर मुख हलै । उनकर दुनो भुजा राजन्य बनलै हल । उनकर जाङ्घ वैश्य बन गेलै आउ उनकर गोड़से शूद्र उत्पन्न होलै ।
विद्वानके व्याख्या
सम्पादित करथिनरामशरण शर्मा कह हथिन कि "ऋग्वैदिक जनम आधारित वर्ण व्यवस्थाके मूलमे पूर्वजनमके कर्मे है । सब अपन कर्तव्य करहु । ई आपसी समन्वयन जनम कर्तव्यके बटवाराके आधार पर सङ्गठित हलै आउ नहिए धनके अन्तरके आधार पर ।".. [ई] मुख्य रूपसे नातेदारी, जनजाति आउ वंशके आधार पर सङ्गठित कैल गेलै हल ।"[१७]
उपनिषद्
सम्पादित करथिनछान्दोग्य उपनिषद् सङ्केत कर है कि कोनो व्यक्तिके वर्ण ओकर पिछला जनमके कर्मके आधार पर निर्धारित होव है ।[१८][१९][२०]
उनकामे से जे ई संसारमे पिछला जनममे बेस कर्म कैलन हल, उनका ओकरे अनुसार बेस जनम भेट है । ऊ ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्यके रूपमे पैदा होव है । किन्तु जे लोग ई दुनियामे अपन पिछला जीवनमे बुरा काम कैलन हे, उनका कुत्ता, सुअर या जातिहीन व्यक्तिके रूपमे जनम लेके बुरा जनम भेट है । --- छान्दोग्य उपनिषद
वज्रसूची उपनिषद् कह है कि ब्राह्मण होएल जनम, ज्ञान या कर्म पर निर्भर न कर है, बल्कि अपन आन्तरिक स्व (आत्मान) के बुझे पर निर्भर कर है ।[२१]
"फिर वास्तवमे ब्राह्मण कौन है ? जे सीधे तौरपर अपन आत्माके जान लेलकै हे ऊ बिन कोनो वर्ग आउ कर्मके है[...] जे हर चीजमे व्याप्त सब चीजमे व्याप्त है । [ऊ जे] सांसारिक पियासके दोषसे रहित है वस्तु आउ वासना... जेकर मन [अभिमान आउ अहङ्कार] से अछूत है, ओही ब्राह्मण है । ऐसन वेद, स्मृति, इतिहास आउ पुराणके मत है, अन्यथा कोनो ब्राह्मणके दर्जा प्राप्त न कर सक है ।
एकरो देखथिन
सम्पादित करथिनसन्दर्भ
सम्पादित करथिन- ↑
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