ऊर्जा संरक्षणके नियम
उर्जा बचावे वाउर्जा संरक्षण के उपाय आदि लागि देखी - उर्जा संरक्षण ।


उर्जा संरक्षणके नियम (law of conservation of energy) भौतिकशास्त्रके एक प्रयोगाधारित नियम (empirical law) हे ।
एकर अनुसार
- कौनो अयुक्त निकाय (isolated system) के कुल उर्जा समयके साथे नियत रहहे । अर्थात् ऊर्जाके न त निर्माण सम्भव हे नहिए विनाश; केवल एकर रूप बदलल जा सकहे । उदाहरणला गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जामे बदल सकहे; विद्युत उर्जा, ऊष्मीय ऊर्जामे बदल सकहे; यान्त्रिक कार्यसे ऊष्मा उत्पन्न हो सकहे । अर्थात् ऊर्जा अविनाशी हे ।
उष्मागतिविज्ञानके प्रथम नियमो वास्तवमे उर्जा संरक्षणके नियमके एक परिवर्तित रूप हे ।
परिचय
सम्पादित करथिनवैद्युत घट (सेल) द्वारा रासायनिक ऊर्जा वैद्युत ऊर्जामे परिणत होवहे । ई बिजलीसे हमनी प्रकाश पैदा कर सकही । सूर्यके प्रकाशसे प्रकाश-संश्लेषण क्रिया द्वारा प्रकाश-ऊर्जा पेड़के रासायनिक ऊर्जामे परिणत होवहे । ऐसन क्रिया द्वारा ई स्पष्ट है कि विभिन्न परिवर्तनमे ऊर्जाके केवल रूप बदलहे । ऊर्जाके मानमे कौनो अन्तर नै आवे ।
ऊर्जा-अविनाशिता-सिद्धान्त दन्ने पहिला पद प्रसिद्ध डच वैज्ञानिक क्रिश्चियन हाइगेञ्ज उठौलन जे न्यूटनके समकालीन हलन । अपन एक पुस्तकमे हाइगेञ्ज कहलन कि जखनि दु पूर्णतः प्रत्यास्थ (इलैस्टिक) पिण्डमे सङ्घात (टक्कर) होवहे त उनकर द्रव्यमान आउ उनकर वेगके गुणनफलके योग सङ्घातके बादो अत्ते रहहे जेत्ता टक्करके पहिले ।
कुछ लोगके अनुमान हे कि यान्त्रिक ऊर्जाके अविनाशिताके सिद्धान्तके पता न्यूटनके हल । किन्तु स्पष्ट शब्दसे सबसे पहिले लाग्राञ्ज एकर बरिस १७८८ ई मे व्यक्त कैलन । लाग्राञ्जके अनुसार ऐसन पिण्डसमुदायमे जेकरा पर कौनो बाहरी बलके प्रभाव न पड़ैत होवे, यान्त्रिक ऊर्जा, अर्थात् स्थितिज ऊर्जा एवं गतिज ऊर्जाके योग, सर्वदा एके रहहे ।