अरुण (हिन्दुधर्म)

हिन्दुधर्ममे देवता
(अरुण (हिन्दु धर्म) से पुनर्निर्देशित)

हिन्दुधर्मके पौराणिक मान्यताके अनुसार अरुण के भगवान सूर्यनारायणके सारथी मानल जा है । ऊ प्रजापति कश्यप आउ विनताके पुत्र हथिन । ऊ गरुड़के बड़ भाई हथिन जे पक्षी सबके राजा हथिन । रामायणमे प्रसिद्ध सम्पाती आउ जटायु एही गरुड़के पुत्र हलथिन । अरुणके पत्नीके नाम श्येनी बतावल गेलै हे । अरुणके पुराण आउ वेदमे एगो गरुड़के रूपमे वर्णित कैल गेलै हे आउ एहु ग्रन्थमे बतावल गेलै हे कि अरुणके गोड़ आउ पङ्ख न है किन्तु इनकर शक्तिके विषयमे व्यासजी उल्लेख कैलन हे कि जनम ग्रहण करतहीँ इनकर तेजसे समस्त आकाश नील रङ्गसे अरुण अर्थात् लाल रङ्गके हो गेलै जौन कारण इनका अरुण नाम देल गेलै ।

रथ चलावित अरुण

अरुण देवके जन्म

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महर्षि कश्यपके सत्रह पत्नी हलन । जेकरामे उनका कद्रू आउ विनतासे विशेष लगाव हलै । एक बेर कद्रू कश्यपसे हजार समान बलशाली नागके पुत्र रूपमे माङ्गलन आउ विनता दु ऐसन पुत्रके माङ्ग कैलन जे कद्रूके सहस्र नागोसे जादे बलवान होवे । वरदानके फलस्वरूप विनता दु आउ कद्रू हजार अण्डा देलन । दुनो अपन अपन अण्डाके गरम बर्तनमे उबालेला रख देलन । पाँच सौ वर्ष बाद कद्रूके प्रथम अण्डामे से शेषनाग, दोसरसे वासुकी , तेसरसे तक्षक आउ बाकी अण्डासे अन्य नागके जनम होलै किन्तु विनताके दुनो अण्डामे से एको अण्डा न फूटलै । उतावली होके विनता एक अण्डा स्वयं फोड़ देलन जेकरामे एक बलशाली गरुड़ जातिके पक्षी शिशु हलै जेकर ऊपरेके देह विकसित हलै किन्तु नीचेके देह कच्चा हलै । अपन माताके ई कृत्य पर ऊ अपन माताके शाप देलन कि "माता अपने अपन बहिनसे बराबरी करेला हमरा आधा शरीरके बना देलन हे एहीसे हम अपनेके शाप दे ही कि अपनेके पाँच सौ बरस तक ओही सौतके दासी बनके रहे पड़तै । यदि अपने दोसरो अण्डा फोड़ देलन त अपने सदा कद्रूके दासी बनके रहबऽ । यबि अपने प्रतीक्षा कैलऽ त ओही बालक अपनेके हमर ई शापसे मुक्त करतो ।" महर्षि कश्यप अपन ऊ पुत्रके नाम अरुण रखलन । अरुण भगवान सूर्यके घोर तपस्या करके उनकासे उनकर सारथी बनेके वरदान माङ्गलन हल । समय आवे पर दोसर अण्डासे गरुड़के उत्पत्ति होलै आउ ऊ अपन माताके शापसे मुक्त कैलकै । अपन माताके भूलके कारण अरुण पक्षीराज न बन पौलन आउ नहिए ऊ अपन छोट भाई गरुड़ नियन प्रसिद्ध होलन ।

विवाह आउ सन्तान

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अरुण आउ गरुड़ पक्षी कुलमे दु बहिनसे बियाह कैलन । बड़ बहिन श्येनीके विवाह अरुणके साथे होलै आउ ऊ दु अण्डा देलन जेकरासे सम्पाती आउ जटायुके जनम होलै । छोट बहिन उन्नतिके बियाह गरुड़के साथे होलै आउ ऊ एक अण्डा देलन जेकरासे सुमुखके जनम होलै ।

अरुण देव द्वारा बालि आउ सुग्रीवके जन्म

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ऐसन कहल जा है कि रामायणमे प्रसिद्ध वानर बन्धु बालि आउ सुग्रीव अरुणेके पुत्र हलन । सुग्रीवके पिता सूर्य आउ माता अरुण हलन आउ बालिके पिता इन्द्र आउ माता अरुण हलन । सूर्य रोज सात उज्जर घोड़ाके रथ पर निकलऽ हथिन जेकर सञ्चालन अरुण करऽ हथिन । एक बेर एक ऋषि सूर्यके शाप देलन कि ऊ पृथ्वी पर प्रकाशमान न होथिन । तहिएसे सूर्य रथके सवारी बन्द कर देलन जेकरासे अरुणदेव भिरु कोनो काम न रहलै । अरुण देवके इच्छा स्वर्गमे जाके अप्सरा सबके दिव्य नृत्य देखेके इच्छा रहऽ हलै । ऊ ई अवसरके लाभ उठाके एक युवतीके वेष धारण कैलन आउ अप्सराके नृत्य देखे स्वर्गलोक पहुँच गेलन । इन्द्र जेकि ई नृत्यके आनन्द ले रहलन हल युवती रूपी अरुणके देखलन आउ ओकरा पर मोहित हो गेलन । दुनो समागम कैलन आउ कालान्तरमे अरुण एक बालकके जनम देलन जेकर सुन्दर केश होवेके चलते बालि नाम रखल गेलै । अरुण ई बात सूर्यदेवसे कहलन त ऊ अरुणदेवके उनकर ऊ अप्सरा रूपमे आवेला कहलन । अरुण अपन ऊ रूपमे आ गेलन । सूर्यो उनका पर मोहित हो गेलन । दुनो समागम कैलन आउ कालान्तरमे अरुण देव एक आउ बालकके जनम देलन जेकर सुन्दर ग्रीवा होवेके चलते सुग्रीव नाम रखल गेलै । अरुण देव अपन पुत्र महर्षि गौतम आउ उनकर पत्नी अहिल्याके सौँप देलन आउ दुनो बालि आउ सुग्रीवके पालन पोषण कैलन ।

एकरो देखथिन

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